आविन्यों
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लेखक परिचय
अशोक वाजपेयी
जन्म : 16 जनवरी 1941 ई0, छत्तीसगढ़ के दुर्ग
मूल निवास : सागर, मध्यप्रदेश
पिता : परमानन्द वाजपेयी
माता : निर्मला देवी
इन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा गवर्नमेंट हायर सेकेंड्री स्कूल, सागर में पाई तथा सागर विश्वविद्यालय से बी० ए० और स्टीफेंस महाविद्यालय दिल्ली से अंग्रेजी विषय में एम० ए० किया।
रचनाएँ : शहर, अब भी संभावना है, एक पतंग अनंत में, अगर इतने से, तत्पुरुष, बहुरी अकेला, थोड़ी सी जगह, घास में दुबका आकाश, आविन्यों, अभी कुछ और समय के पास समय, इबादत से गिरी मात्राएँ, उम्मीद का दूसरा नाम, विवक्षा, दुःख चिट्ठी रसा आदि।
पाठ परिचय : प्रस्तुत पाठ ’आविन्यों’ इसी नाम के गद्य एवं कविता के सर्जनात्मक संग्रह से संकलित है। आविन्यों दक्षिण फ्रांस का एक मध्ययुगीन ईसाई मठ हैं जहाँ लेखक ने इक्कीस दिनों तक एकान्त रचनात्मक प्रवास का अवसर पाया था। प्रवास के दौरान प्रतिदिन गद्य एवं कविताएँ लिखी थी।
आविन्यों पाठ का सारांश
लगभग दस बरस पहले पहली बार आविन्यों गया था। दक्षिण फ्रांस में रोन नदी के किनारे बसा एक पुराना शहर है जहाँ कमी कुछ समय के लिए पोप राजधानी थी और अब गर्मियों में फ्रांस ओर यूरोप का एक अत्यन्त प्रसिद्ध और लोकप्रिय रंग-समारोह हर बरस होता है। उस बरस वहाँ भारत केन्द्र में था। पीटर बुक का विवादास्पद ‘महाभारत’ पहले पहल प्रस्तुत किया जानेवाला था और उन्होंने मुझे निमंत्रण भेजा था।
रोन नदी के दूसरी ओर आविन्यों का एक हिस्सा है जो लगभग स्वतंत्र है। नाम है वीलनव्वल आविन्यों-वहाँ दरअसल फ्रेंच शासकों ने पोप की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किला बनवाया था। उसी में काथूसियन सम्प्रदाय का एक ईसाई मठ बना ला शत्रूज। चौदहवीं सदी से फ्रेंच क्रांति तक उसका धार्मिक उपयोग होता रहा। अब इसमें एक कलाकेन्द्र स्थापित है। यह केन्द्र इन दिनों रंगमंच और लेखन से जुड़ा हुआ है।
- श्रम विभाजन और जाति-प्रथा
- विष के दाँत
- भारत से हम क्या सीखें
- नाखून क्यों बढ़ते हैं
- नागरी लिपि
- बहादुर
- परंपरा का मूल्यांकन
- जित-जित मैं निरखत हूँ
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मेरा प्रवास वहाँ उन्नीस दिन का था, 24 अक्टूबर से 10 नवम्बर 1994 की दोपहर तक। कुल उन्नीस दिनों में पैंतीस कविताएँ और सत्ताईस गद्य रचनाएँ लिखी गई। आविन्यों फ्रांस का एक प्रमुख कलाकेन्द्र रहा है। पिकासो की विख्यात कृति का शीर्षक है ‘लमादामोजेल द आविन्यों’
प्रतीक्षा करते हैं पत्थर
किसी देवता या काल की नहीं पता नहीं किसकी प्रतीक्षा करते हैं पत्थर-धीरज से रेशा रेशा झिरते हुए, शिरा-शिरा घिलते हुए, प्रतीक्षारत रहते हैं एन्थर। बिना शब्द कविता लिखते हैं, पत्थर। पता नहीं किसकी प्रतीक्षा करते हैं पत्थर।
नदी के किनारे भी नदी है
यहाँ पास में ही रोन नदी है। । इस तरफ वीलनव्व और दूसरी ओर आविन्यों। । तट पर बैठो तो कई बार लगता है कि जल स्थिर है और तट ही बह रहा है। नदी तट पर बैठना भी नदी के साथ बहना है; कई बार नदी स्थिर होती है, हम तट पर बैठे रहते हैं। नदी के पास होना नदी होना है। । नदी किसी को अनदेखा नहीं करती, वह सबको भिगोती है, अपने साथ करती है। उसी प्रकार कविता में हम बरबर ही शामिल हो जाते हैं।
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